ऐलनाबाद, 20 जून(भार्गव):बीती रात्रि क्षेत्र में हुई बरसात से जहां गर्मी से झुलस रहे लोगों को राहत पहुंचाई है वहीं किसानों के लिए भी किसी सौगात से कम नहीं है क्योंकि क्षेत्रीय किसानों द्वारा हाल ही में बिजी गई नरमा, कपास, ज्वार, बाजरा व चावल की फसल को इस वक्त पानी की सख़्त जरूरत थी। पिछले कुछ दिनों से गर्मी की अधिकता के कारण बिजी गई यह फसलें उमस और गर्मी से बेजान होती जा रही थी। मगर अब बरसात हो जाने से खेतों में अंकुरित फसलों को नवजीवन मिल गया है। बरसात का मौसम गत रात्रि से ही निरंतर बना हुआ है व रुक-रुक कर अब भी मेघा बरस रहे है, जिसे देख कर किसानों के चेहरों पर रौनक स्पष्ट देखी जा रही है। विद्युत आपूर्ति व पेयजल आपूर्ति की भी एक सप्ताह से कमी देखी जा रही थी। बिजली के अघोषित कट लोगों को परेशान किए हुए थे तथा बिजली के लोढ़-बढ़ जाने के कारण बार-बार विद्युत ट्रांसफार्मर जल जाने से लोगों को बेहद कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा था। रात्रि हुई बरसात ने इन कठिनाईयों को तो कम किया ही है साथ ही साथ तपते वातावरण को भी शीतल कर क्षेत्र में शीतलता बरसाई है, जिसके फलस्वरूप लोगों, पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों को भी भयंकर गर्मी से राहत मिली है। मौसम के जानकार बुजुर्गों के अनुसार यह मानसून पूर्व की बरसात है जो खेतीबाड़ी के लिए अत्यधिक लाभकारी समझी जाती है। उन्होंने बताया कि आगामी कुछ ही दिनों में मानसून की बरसात भी शुरू होने वाली है तथा मौसम के मिजाज को देखते हुए ऐसा आभास हो रहा है कि इस क्षेत्र में वर्षा की पूर्णता से धन-धान्य व कृषि उत्पादन में कोई कमी नहीं रहेगी क्योंकि पूर्वी व उत्तरी हवाओं का रुख देखते हुए यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
मानसून पूर्व हुई बरसात से खिले किसानों के चेहरे लोगों को गर्मी से मिली राहत
सडक़ दुर्घटना में युवक की दर्दनाक मौत
ऐलनाबाद, 25 जनवरी (भार्गव): शहर की हनुमानगढ़ रोड पर भूतेश्र्वर नाथ महादेव मंदिर के निकट मोड़ पर बीती सायं हुई एक सडक़ दुर्घटना में लगभग 26 वर्षीय युवक की मृत्यु हो गई, जबकि एक व्यक्ति घायल हो गया। मामले की जांच कर रहे पुलिस उप निरीक्षक सत्यवीर सिंह ने बताया कि गांव प्रतापनगर के नजदीक स्थित एक ढाणी का निवासी लगभग 26 वर्षीय हरमीत सिंह पुत्र मुख़्तयार सिंह बीती सायं साढ़े 6 बजे अपने मोटरसाइकिल पर सवार होकर काशी राम का बास की तरफ से ऐलनाबाद आ रहा था, कि तभी भूतेश्र्वर नाथ महादेव मंदिर केञ् निकट स्थित मोड़ पर विपरीत दिशा से आ रहे ट्रैक्टर-ट्राली से टकराने के कारण वह सडक़ पर गिर पड़ा। इस दुर्घटना में हरमीत को गंभीर चोटें लगी जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई, जबकि ट्रैक्टर-ट्राली के एकदम से टेढ़ा हो जाने के कारण ट्राली में सवार राजस्थान के के एम चक निवासी घड़सीराम पुत्र बुधराम घायल हो गया। उसे तुरंत एक निजी अस्पताल में लाया गया जहां से उसे किसी अन्य बड़े अस्पताल में रेफर कर दिए जाने की सूचना है। दुर्घटना केञ् बाद ट्रैक्टर चालक ट्रैक्टर-ट्राली को मौके पर ही छोडक़र फरार हो गया। एएसआई सत्यवीर सिंह ने बताया कि मृतक का शव पंचनामे के बाद पोस्टमार्टम के लिए सिरसा स्थित सामान्य अस्पताल भिजवा दिया गया, जबकि ट्रैक्टर चालक के विरुद्ध मामला दर्ज कर उसकी तलाश शुरू कर दी है।
महाशक्ति ने माना, भारत विश्वशक्ति
नई दिल्ली । तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक एच. ओबामा आज जैसे भारत और भारतीयों के साथ खड़े नजर आए। दीपावली के तोहफे के रूप में उन्होंने भारत को एक महाशक्ति माना और कहा कि उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होना चाहिए। इसी के साथ उन्होंने पाकिस्तान को भी साफ-साफ चेताया कि उसकी भूमि का आतंककारियों की ओर से इस्तेमाल किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जाएगा और उसे मुम्बई विस्फोटों के दोषियों को सजा देनी ही होगी।भारत यात्रा के अंतिम चरण में ओबामा ने आज केन्द्रीय कक्ष में संसद के संयुक्त अघिवेशन को सम्बोघित करते हुए कहा कि भारत अब उभरती ताकत नहीं है बल्कि विश्व शक्ति बन चुका है।
मंदिर तोड़ कर बनाई गई थी मस्जिदः हाई कोर्ट
लखनऊ।। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि पर फैसला देते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया है। राम चबूतरा और गर्भ गृह दोनों निर्मोही अखाड़ा को दे दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। लखनऊ के डीएम अनिल कुमार सागर ने कहा कि मामले से सीधे तौर पर जुड़े लोगों को ही कोर्ट नंबर 21 में प्रवेश करने की इजाजत थी। जिन्हें प्रवेश दिया गया उन्हें फैसला सुनाए जाने से पहले कक्ष से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। डीआईजी राजीव कृष्ण ने कहा कि फैसले के बाद किसी तरह के विजय जुलूस या गम के प्रदर्शन के आयोजन पर पहले से ही पाबंदी लगी हुई है। अगर इस रोक के बावजूद ऐसी कोई कोशिश की गई तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट को 24 सितंबर को ही फैसला सुना देना था, लेकिन पूर्व नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को निर्णय एक हफ्ते के लिए टाल दिया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपाठी की अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद हाई कोर्ट के फैसले सुनाने का रास्ता साफ हुआ।. अर्से पुराने मुद्दे का दोनों समुदायों के बीच बातचीत से कोई हल नहीं निकल सका। पूर्व प्रधानमंत्रियों- पी. वी. नरसिम्हा राव, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर ने भी इस मुद्दे के बातचीत से निपटारे की कोशिश की थी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। हालांकि, उस जमीन पर विवाद तो मध्ययुग से चला आ रहा है लेकिन इसने कानूनी शक्ल वर्ष 1950 में ली। देश में गणतंत्र लागू होने से एक हफ्ते पहले 18 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने विवादित स्थल पर रखी गईं मूर्तियों की पूजा का अधिकार देने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। तब से चली आ रही इस कानूनी लड़ाई में बाद में हिन्दुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर अनेक पक्षकार शामिल हुए। अदालत ने इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के सैकड़ों गवाहों का बयान लिया। अदालत में पेश हुए गवाहों में से 58 हिन्दू पक्ष के, जबकि 36 मुस्लिम पक्ष के हैं और उनके बयान 13 हजार पन्नों में दर्ज हुए। हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई ) से विवादित स्थल के आसपास खुदाई करने के लिए कहा था। इसका मकसद यह पता लगाना था कि मस्जिद बनाए जाने से पहले उस जगह कोई मंदिर था या नहीं। हिंदुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में हुई खुदाई मार्च में शुरू होकर अगस्त तक चली। इस विवाद की शुरुआत सदियों पहले सन् 1528 में मुगल शासक बाबर के उस स्थल पर एक मस्जिद बनवाने के साथ हुई थी। हिंदू समुदाय का दावा है कि वह स्थान भगवान राम का जन्मस्थल है और पूर्व में वहां मंदिर था। विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने वर्ष 1859 में दोनों समुदायों के पूजा स्थलों के बीच बाड़ लगा दी थी। इमारत के अंदर के हिस्से को मुसलमानों और बाहरी भाग को हिन्दुओं के इस्तेमाल के लिए निर्धारित किया गया था। यह व्यवस्था वर्ष 1949 में मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्ति रखे जाने तक चलती रही। उसके बाद प्रशासन ने उस परिसर को विवादित स्थल घोषित करके उसके दरवाजे पर ताला लगवा दिया था। उसके 37 साल बाद एक याचिका पर वर्ष 1986 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज ने वह ताला खुलवा दिया था समय गुजरने के साथ इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। वर्ष 1990 में वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या के लिए एक रथयात्रा निकाली, मगर उन्हें तब बिहार में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। केंद्र में उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी। 31 अक्टूबर 1990 को बड़ी संख्या में राम मंदिर समर्थक आंदोलनकारी अयोध्या में आ जुटे और पहली बार इस मुद्दे को लेकर तनाव, संघर्ष और हिंसा की घटनाएं हुईं। सिलसिला आगे बढ़ा और 6 दिसम्बर 1992 को कार सेवा करने के लिए जुटी लाखों लोगों की उन्मादी भीड़ ने वीएचपी, शिव सेना और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। प्रतिक्रिया में प्रदेश और देश के कई भागों में हिंसा हुई, जिसमें लगभग दो हजार लोगों की जान गई। उस समय उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में पी. वी. नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कांग्रेस की सरकार थी। हालांकि, इस बार अदालत का फैसला आने के समय वर्ष 1990 व 1992 की तरह कोई आंदोलन नहीं चल रहा था, बावजूद इसके सुरक्षा को लेकर सरकार की सख्त व्यवस्था के पीछे कहीं न कहीं उन मौकों पर पैदा हुई कठिन परिस्थितियों की याद से उपजी आशंका थी। अयोध्या के विवादित स्थल पर स्वामित्व संबंधी पहला मुकदमा वर्ष 1950 में गोपाल सिंह विशारद की तरफ से दाखिल किया गया , जिसमें उन्होंने वहां रामलला की पूजा जारी रखने की अनुमति मांगी थी। दूसरा मुकदमा इसी साल 1950 में ही परमहंस रामचंद्र दास की तरफ से दाखिल किया गया , जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया। तीसरा मुकदमा 1959 में निर्मोही अखाडे़ की तरफ से दाखिल किया गया, जिसमें विवादित स्थल को निर्मोही अखाडे़ को सौंप देने की मांग की गई थी। चौथा मुकदमा 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल बोर्ड की तरफ से दाखिल हुआ और पांचवां मुकदमा भगवान श्रीरामलला विराजमान की तरफ से वर्ष 1989 में दाखिल किया गया। वर्ष 1989 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता की अर्जी पर चारों मुकदमे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में स्थानांतरित कर दिए गए थे।
कश्मीर की गुत्थी कैसे सुलझे
कश्मीर पर सर्वदलीय बैठक बुलाने का निर्णय तो सही है, लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा भी निकलना चाहिए। सरकार की जवाबदेही है कि वह कोई भी फैसला करते हुए विपक्ष को भरोसे में जरूर ले। दूसरी तरफ यह अपोजीशन की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह केवल आलोचना और शिकायत करने के बजाय सरकार को उचित सलाह दे और उसे हर संभव सहयोग करे। गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति (सीसीएस) ने कश्मीर मसले पर अपनी बैठक में ऑल पार्टी मीटिंग बुलाने का निर्णय किया। फिलहाल कश्मीर में जारी संकट के समाधान का सूत्र एक बिंदु के इर्द-गिर्द आकर सिमट गया लगता है। वह है आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट(एएफएसपीए)।
राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि इस कानून को अगर कुछ जिलों से हटा दिया जाए तो उन्हें पत्थरबाजों से निपटने में सहूलियत होगी। लेकिन सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ऐसा करने से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। उनके मुताबिक उमर अब्दुल्ला की गलत नीतियों से ही राज्य में हिंसा भड़की है, लेकिन सीएम अपनी नाकामियों का ठीकरा सुरक्षा बलों के सिर फोड़ना चाहते हैं। मुख्य विपक्षी दल बीजेपी की भी यही राय है। उसका कहना है कि एएफएसपीए में थोड़ी भी ढील घातक साबित हो सकती है। बीजेपी चाहती है कि उमर अब्दुल्ला अपना पद छोड़ दें। खुद यूपीए सरकार के भीतर भी एएफएसपीए को लेकर एक मत नहीं है। सच कहा जाए तो कश्मीर के मुद्दे पर भारी असमंजस की स्थिति दिखाई दे रही है।
समस्या से निपटने की सीधी जवाबदेही राज्य सरकार की थी, पर वह एक के बाद एक गलती करती रही और हालात बिगड़ते गए। आज कश्मीर के एक बड़े तबके के भीतर कानून और सुरक्षा एजेंसियों का कोई खौफ नहीं रह गया है। वे जब चाहते हैं लॉ एंड ऑर्डर का मखौल उड़ाते हैं। राज्य सरकार और वहां की राजनीतिक शक्तियों में आपसी विश्वास की भारी कमी है, इस कारण कोई राजनीतिक पहलकदमी भी कठिन होती जा रही है। सत्तारूढ़ नैशनल कॉन्फ्रेंस को सोचना चाहिए कि आखिर उससे कहां चूक हो रही है? आखिर क्यों वह गवर्नेन्स और सियासत, दोनों ही स्तरों पर लड़खड़ा रही है? अगर संभव हो तो उसे अपने नेतृत्व और कामकाज के तौर-तरीके में तब्दीली के बारे में भी सोचना चाहिए। कश्मीर की गुत्थी को सुलझाने के लिए सबको अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर सोचना होगा।
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