सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी छोटी सी उम्र में बच्चे खुद के वजन से ज्यादा बैग का भार उठा रहे हंै। स्कूलों में सबसे ज्यादा एलकेजी, यूकेजी, केजी और नर्सरी के नन्हें मुन्ने पांच से सात किलोग्राम भार तक के बैग उठाने को मजबूर हैं। अभिभावक, स्कूल संचालक और शिक्षा अधिकारी बच्चों की कमर पर लटके भारी भरकम स्कूली बैग से होने वाली हानि से अभी तक अनभिज्ञ हैं।
नियमों की अनदेखी
सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के अनुसार छोटी कक्षाओं के बच्चों पर स्कूली बैग नहीं होना चाहिए। इन कक्षाओं के बच्चों की किताबों की व्यवस्था स्कूल में होनी चाहिए। बच्चों के शारीरिक विकास को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष बस्ते का वजन नाममात्र का करने का फैसला लिया था।
शरीर पर पड़ता है विपरित असर
सिविल अस्पताल के एमएस एवं हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. वेद गुप्ता का कहना है कि छोटे बच्चे के शरीर पर अपेक्षा से अधिक वजन डालने से उसका शरीर पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता। सिंगल तनी का बैग कंधे पर डालने से बच्चे का झुकाव उसी तरफ हो जाता है। जबकि डबल तनी का बैग कमर पर टांगने से बच्चे के कंधें का झुकाव आगे की तरफ हो जाता है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों की डाइट पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बच्चों को लोहे की कढ़ाई में दूध पकाकर पिलाना चाहिए। साथ ही उसे केल्शियम, आयरन और प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन कराना चाहिए और पौष्टिकता से परिपूर्ण खाद्य पदार्थ खिलाने चाहिए।
स्कूल प्रबंधन की तरफ से होमवर्क देना बंद कर दिया गया था। अभिभावकों ने स्कूल में आकर होमवर्क देने की बात कही। इसके बाद होमवर्क देना शुरू किया गया। अभिभावकों को बच्चों के बैग में कम से कम किताबें डालने की सलाह दी जाती है। अभिभावक ऐसी बातों को अनदेखा कर देते हैं।पूनम
बच्चो का कोना
उम्र छोटी, बस्ता भारी
फिल्मो का बच्चो पर प्रभाव:
टीचर :- महात्मा गाँधी कौन थे?
बच्चे :- महात्मा गाँधी वो थे,
जिन्होंने मुना भाई की लड़की पटाने में मदद की थी!
प्यारे बच्चो आओ
आओ प्यारे बच्चो आओ ।
एक मेरी बात सुन जाओ ॥
पर्यावरण क्यों गंदा है ।
साफ इसे क्यों नहीं करते हैं ॥
अगर पर्यावरण साफ बनाना है ।
कूड़ा कचरा आदि नहीं फेकना है ॥
पन्नी का प्रयोग नहीं करना है ।
कपड़े का कोई झोला बनाओ न ॥
उसमें गुड-चीनी भर लाओ न ।
आओ प्यारे बच्चो आओ ॥







