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फैशन की दुनिया में नंबर वन है न्‍यूयार्क

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लॉस एंजिल्स | ‘विश्व फैशन नगरी-2010’ का ताज एक बार फिर से न्यूयार्क शहर को मिला है। मिलान में हुए एक सालाना सर्वेक्षण में न्यूयार्क को यह सम्मान दिया गया है। वैसे सर्वेक्षण में भारत की मायानगरी मुंबई और दिलवालों की दिल्ली अपने को फैशन नगरी के रूप में ‘टॉप 20’ में शुमार कराने में असफल साबित हुए। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनीटर के सालाना सर्वेक्षण 2010 में जहां मुंबई को 28वें पायदान पर रखा गया है वहीं दिल्ली, मुंबई से दो पायदान पिछड़ते हुए 30वें स्थान पर जगह बना पाई।

पिछले वर्ष मुंबई को इस सर्वे में 16वां स्थान प्राप्त हुआ था और दिल्ली 17वें पायदान के साथ फैशनपरस्ती में ‘टॉप 20’ में जगह बनाने में कामयाब रही थी।वर्ष 2008 में फैशन के मामले में इन दोनों शहरों को क्रमश: 22वां और 24वां स्थान हासिल हुआ था।

सफारी सूट बहुत पोपुलर होता था

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सफारी सूट बहुत पोपुलर होता था - यह ड्रेस बैंक अधिकारिओं के लिए डिजाईन किया गया था - पर यह शादी विवाह में बहुत पोपुलर हो गया - जो शादी में "सूट" नहीं सिलवा पाता वो 'सफारी सूट" जरुर सिलवाता - और धीरे - धीरे सफारी का पैंट की जगह 'लूंगी' ले लेता था :) बड़ा ही बेजोड कम्बिनेशन था ;) स्सफारी सूट और हाथ में एक ८ इंच का कला बैग - भर मुह पान - पतली मुछ ;)

भारतीय फैशन का फसाना

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कई लोगों को लगता है कि फैशन एक ओछी और बेकार की चीज है, जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों से दूर की चीज. खासकर हाई फैशन या कहें कि नया चलन पैदा करने वाले फैशन को ऐसे अमीर लोगों से ही जोड़कर देखा जाता है जो दिखावा पसंद होते हैं. मगर सच्चाई ये है कि अपने मूल में फैशन भौतिक सुंदरता और बौद्धिकता का एक खूबसूरत गठजोड़ है. यह हमारे भीतर के उस अनजाने केंद्र से उपजता है जो कला की कद्र करता है, संगीत से द्रवित होता है और सुंदरता को देखकर प्रसन्नता से भर जाता है. फैशन उसी समृद्ध और अज्ञात कोने से जन्म लेता है जहां स्मृतियां और कल्पनाएं आपस में गुंथती हैं और नई-नई फंतासियों को जन्म देती हैं. कुल मिलाकर कहा जाए तो फैशन और उसका अध्ययन इतना हक तो रखता है कि उस पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए

फैशन से इंसान का लगाव हमेशा से ही रहा है. नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में खुदाई में निकले सिंधु घाटी सभ्यता के जो अवशेष प्रदर्शित किए गए हैं उनमें एक महिला के कंकाल की कलाई पर सीपियों से बनी उत्कृष्ट चूड़ियां भी हैं. हो सकता है कि कई हजार साल पहले की उस सभ्यता में ये सुहाग का प्रतीक रही हों. ये भी हो सकता है कि ऐसी चूड़ियां सभी औरतें पहनती हों. प्रागैतिहासिक काल के इन आभूषणों के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहना शायद संभव न हो मगर ये जरूर बिना शक के कहा जा सकता है कि ये सुंदर दिखने की चाह की उपज थे और आधुनिक भारतीय आज भी फैशन के उतने ही दीवाने हैं.

नेहरूवाद से पल्ला झाड़ने और 90 के दशक में उदारीकरण की दौड़ लगाने के बाद भारतीय फैशन परिदृश्य में तेजी से विस्तार हुआ है. 1980 के दशक में अपने करिअर की शुरुआत होने के चलते मैं भी इन बदलावों का हिस्सा रहा हूं. मेरी जिंदगी के कुछ अहम मोड़ रचनात्मक ठहराव के उन क्षणों की वजह से आए जो मैंने इस दौरान महसूस किए. ये वह मुकाम था जब मैं फैशन की दुनिया के नकलीपन और हर सीजन में कुछ नया लुक देने की इसकी जरूरतों से थक चुका था. कुछ नया रचने के इस दबाव के चलते ही आज का रेट्रो दौर भी पैदा हुआ है जहां हम अपनी नई डिजाइनें पुराने आइडियाज पर ही फिर से काम करके बनाते हैं. सच तो यह है कि फैशन 1960 के दशक में ही मौलिकता की ऊंचाइयों पर पहुंच गया था. उसके बाद से हर चीज बस नई बोतल में पुरानी शराब परोसने जैसी है.

हालांकि आइसाई मियाके जैसे जापानी डिजाइनर्स इसका अपवाद हैं जिन्होंने पश्चिमी वस्त्रों में पूरब की तकनीक का समावेश किया. जापानियों ने अपनी सहज बुद्धि के चलते अपने काम में अपने देश की छाप बनाए रखी. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लग रहा है कि अब दौर भारत का है और इसलिए हमारे डिजाइनर्स को चाहिए कि वे अपनी भारतीयता को ज्यादा से ज्यादा महत्व दें.

भारतीय फैशन उद्योग में अपार संभावनाएं हैं मगर इस दिशा में उस तरह से काम नहीं हो रहा जो भारत को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अगुवा खिलाड़ी बना सके. भारतीयता को किस तरह ऐसे इस्तेमाल किया जाए कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी पूछ बढ़े, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण मनीष अरोड़ा हैं. यही वजह है कि इतनी बडी संख्या में अंतर्राष्ट्रीय शख्सियतें उनके बनाए कपड़े पहनते हैं.

तरुण तहलियानी और सब्यसाची मुखर्जी जैसे दूसरे बड़े फैशन कारोबारी अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को आकर्षित नहीं करते. शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि वे असल के बजाय भारतीयता की प्रवासी भारतीय ब्रांड वाली पहचान से इत्तेफाक रखते हैं. यही वजह है कि उनमें वह बात नहीं है जो भारत से बाहर सफल होने के लिए जरूरी है. सैवियो जॉन, वरुण  सरदाना, अस्तु, अंश और जेसन जैसे लोग बढ़िया काम कर रहे हैं. वे इसे कारोबार की तरह अंजाम दे रहे हैं और उनकी तैयारी भी पूरी है जो निश्चित रूप से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उभरने में उन्हें मदद देगी.

भारतीय डिजाइनरों, खासकर जिन्होंने खूब नाम कमाया है, को अपने कशीदाकारों का शुक्रगुजार होना चाहिए. भारत में शादी और विशेषकर दुल्हन के परिधानों का जो बाजार है वह पूरी तरह से कढ़ाई के काम पर आधारित है. तरुण तहलियानी के पास 200 कारीगर हैं और दिल्ली में जेजे वलाया के पास भी करीब इतने ही होंगे. कोलकाता में सब्यसाची मुखर्जी के पास एक पांच मंजिला इमारत है जो इस तरह के कारीगरों से भरी हुई है. मुंबई में एक कारीगर औसतन 7000 रुपए महीना तक कमा सकता है जबकि एक कटर हर महीने 20,000 रुपए तक की कमाई कर सकता है. इन कुशल कारीगरों में से ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार से हैं जिनके परिवारों में पीढ़ियों से हाथ की कढ़ाई का काम होता रहा है.

जरूरत इस बात की है कि कटर, दर्जी और कशीदाकारों को औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाए. असल में कालीन बुनाई और कशीदाकारी ऐसी चीजें हैं जिन्हें बचपन से ही सीखा जा सकता है. और अगर ऐसा नहीं होता तो इस कला में सिद्धहस्त होना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए बाल श्रम से संबंधित कानून में कुछ लचीलापन होना चाहिए. ऐसे स्कूल खोले जाने चाहिए जहां बच्चों की पढ़ाई भी हो और उन्हें इस कला का प्रशिक्षण भी मिलता रहे. हर साल फैशन संस्थानों से सैकड़ों डिजाइनर्स के निकलने का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक हम इसी अनुपात में प्रशिक्षित कारीगर पैदा नहीं सकते.

हमें खुद से कई सवाल पूछने की जरूरत है. आखिर भारतीय फैशन परिदृश्य में सिर्फ डिजाइनर्स को ही इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है जबकि टेक्सटाइल डिजाइनर्स और कशीदाकारी करने वालों की उतनी पूछ नहीं हो रही? हम भारतीयों के डीलडौल से मेल खाते साइज चार्ट क्यों नहीं बनाते? डिजाइनर्स एक मंच पर क्यों नहीं आ रहे? फैशन उद्योग के विकसित होने के लिए ये अहम है कि टेक्सटाइल यानी वस्त्र उद्योग का भी विकास हो. मगर अजीब बात है कि वस्त्र उद्योग के बड़े नाम फैशन में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे और नतीजतन कपड़ों की नई किस्मों का विकास सुस्त रफ्तार से हो रहा है. फैशन काउंसिल को दूसरी चीजों से पहले इन मुद्दों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है.

इसके अलावा पारंपरिक शैलियों की घोर उपेक्षा भी हो रही है. मुख्यधारा के डिजाइनों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि खादी और हस्तशिल्प उद्योग पूरी तरह से दरकिनार हो गया है. अब फैशन के कपड़ा बाजार पर चीन का दबदबा है. बिहार का हाल बहुत बुरा है क्योंकि कोई भागलपुर से रेशम नहीं खरीद रहा. टसर की खरीद भी न के बराबर है और ढकाई को तो हम करीब-करीब खो ही चुके हैं. हिमरू बुनाई शैली भी लुप्त होने के कगार पर है. इसे जानने वाले बस दो ही बुनकर बचे हैं. खादी बहुत संभावनाओं वाला कपड़ा है मगर खादी उद्योग में भी कुछ नहीं हो रहा. होना ये चाहिए कि हमारे खादी भंडार शानदार डिजाइन केंद्र हों. इसके बजाय ये बोझ बन गए हैं. मुंबई में एक खादी भंडार जया बच्चन और देविका भोजवानी को दिया गया ताकि वे इसका कुछ उद्धार कर सकें मगर उन्होंने अपने दोस्तों को बीसेक कुरते बेचने के अलावा कुछ नहीं किया. मैं अतीतवादी हो रहा हूं मगर मुझे लगता है कि भारत को अपने मूल्यों में नेहरू और गांधी की सोच को भी कुछ जगह देनी चाहिए. हम अपने बुनकरों, कशीदाकारों, जरीसाजों और रंगरेजों की अमूल्य दौलत को खोते जा रहे हैं.

भारतीय डिजाइन का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि क्या हम शहरी और ग्रामीण परिप्रेक्ष्य को मिलाकर कुछ ऐसा रच सकते हैं जो सही मायनों में भारतीय सौंदर्य बोध का परिचायक हो. भारत में हाथ से बनी हर चीज की उपेक्षा हो रही है. जबकि सारी दुनिया उसी के बारे में जानना चाहती है जिसकी हमारे यहां उपेक्षा हो रही है. फैशन जगत में वापसी करने के बाद 2007 में हुए लैकमे फैशन वीक में मैंने अपने कलेक्शन में भारतीय शिल्प का इस्तेमाल करने की कोशिश की. इसमें मैंने शोलापुर के कंबल और महाराष्ट्रियन साड़ियों की शैली के तत्वों का इस्तेमाल किया. मगर दुर्भाग्य से इसका एक भी खरीदार नहीं था.

हमारे यहां आयोजित हो रहे फैशन वीक्स में इन चीजों को प्रोत्साहन क्यों नहीं दिया जा रहा है यह रहस्य मेरी समझ में नहीं आता. वैसे जरूरी नहीं कि फैशन वीक्स इस बात का संकेत हों कि ये उद्योग परिपक्व हो गया है. आज इस उद्योग में कोई नियम नहीं हैं. ज्यादातर लोग बस अपनी-अपनी कर रहे हैं. अगर नए विचार लोकप्रिय हो रहे हैं तो ऐसा सिर्फ नकल की वजह से हो रहा है. आप चांदनी चौक चले जाइए और आपको हर डिजाइनर की ड्रेस की हूबहू नकल मिल जाएगी. फैशन टीवी की वजह से अब ये मुमकिन हो गया है कि मुंबई के खार में बैठकर कोई सब्यसाची के डिजाइन की नकल बना ले और उसे उसकी असल कीमत से 80 फीसद कम कीमत पर बेच दे. भारतीय फैशन उद्योग में अभी तक नियम-कायदे जैसी कोई चीज है ही नहीं. यही वजह है कि कुछ डिजाइनर्स अपने परिधानों की ऐसी कीमतें रख कर भी काम चला ले रहे हैं जिनकी कोई तुक ही नहीं है. उदाहरण के लिए हर कोई खरीद तो वही क्रेप और जार्जेट ही रहा है जो आपको 300 रुपए प्रति मीटर आसानी से मिल जाता है. तो इस कपड़े से बनी एक ड्रेस के लिए 95,000 रुपए की कीमत को किस तरह जायज ठहराया जा सकता है?

लैकमे फैशन वीक जैसे आयोजन उन नए डिजाइनर्स के लिए काफी उपयोगी हैं जो अपने लिए एक मंच चाहते हैं या बॉलीवुड में काम करने की तमन्ना रखते हैं. मगर यदि आपकी नजर अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर है और आप खरीदार चाहते हैं तो आपको लैकमे फैशन वीक में कुछ नहीं मिलेगा. इसके उलट भारत में ही आयोजित एंपोरियो फैशन वीक में मुझे कई अंतर्राष्ट्रीय खरीदार देखने को मिले. यहां शो के बाद होने वाले आयोजन भी इस तरह से रखे गए थे कि डिजाइनर्स और खरीदार आपस में घुल-मिल सकें. दूसरे फैशन वीक्स की तरह यहां इस बात की चर्चा नहीं थी कि शो के दौरान आगे की सीट पर कौन-कौन बैठा था या फिर आपके शो में कौन सी हस्ती आई. यहां सबसे ज्यादा अहमियत परिधानों को दी जा रही थी.

हमारे फैशन उद्योग अभी भी परिपक्व नहीं हुआ है इसका एक और उदाहरण है इससे जुड़ी पत्रकारिता. आयोजनों को कवर करने और डिजाइनर्स का इंटरव्यू लेने के लिए अक्सर ऐसे पत्रकारों को भेजा जाता है जो फैशन जगत की बारीकियों से बिल्कुल अनजान होते हैं. इनमें से ज्यादातर नौजवानों का फैशन से कोई लेना-देना नहीं होता. इसलिए पिछले कुछ साल के दौरान मुझे कई बार नई खोज बताया जा चुका है.

इसके अलावा मीडिया का ज्यादा ध्यान वार्डरोब मैलफंक्शन या फिर आयोजन में आई किसी चर्चित हस्ती को कवर करने पर ही रहता है. यहां अभी भी ऐसा कोई पत्रकार नहीं है जो फैशन पर उस तरह की स्तरीय गंभीरता से विमर्श कर सके जिसका ये हकदार है.

भारत में ऊंचे परिवारों से ताल्लुक रखने वाली कई महिलाएं हैं जो अंतर्राष्ट्रीय डिजाइनरों की पोशाकें पहनती हैं. इनकी कीमत 10 लाख रुपये तक भी हो सकती है. इनमें से ज्यादातर महिलाएं भारतीय डिजाइनर्स द्वारा बनाई गई पोशाकें नहीं पहनतीं. जबकि जितना पैसा ये अंतर्राष्ट्रीय डिजाइनों की अपनी सनक के चलते खर्च करती हैं उतने पैसे में भारतीय फैशन उद्योग में खासी जान डाली जा सकती है.

समय आ चुका है कि भारतीय डिजाइनर्स अपनी विरासत से जुड़े तत्वों के मेल से कुछ ऐसा रचें जो हमें दूसरों से अलग करे और इस उद्योग में एक नई ऊर्जा का संचार करे. जरूरत इस बात की है कि हम एक ऐसा चेहरा विकसित करें जो हमें भारतीयता की सबसे अनूठी पहचान भी देता हो और साथ ही फैशन जगत के समकालीन चलन के अनुरूप भी हो. तभी हमारा फैशन उद्योग इटली और जापान, जिन्हें अपने प्रेरणादायी, संवेदनशील और मौलिक डिजाइनों के लिए जाना जाता है, की तरह वह मुकाम हासिल कर पाएगा जिसका ये हकदार है

और अब पहनिए पायजामा-जींस

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क्या मजा आए जब आपकी पतलून जींस की तरह दिखे और पायजामे की तरह सुकून दे तो लीजिए हाजिर है एक नया कॉन्सेप्ट ‘पायजामा जींस’ का।
डिजाइनरों ने ऐसी ही पैंट बनाई है, जो बिलकुल जींस की तरह दिखती है और अहसास पायजामे का देता है। यह परिधान कॉटन और स्पैनडेक्स के मेल से बना है, जो बेहद आरामदायक है और इसमें ढेर सारी पॉकेट हैं, जो ट्रेंडी डेनिम की तरह लगती हैं।
न्यूयॉर्क डेली न्यूज के मुताबिक ‘जेगिंग’ की अपार सफलता के बाद डिजाइनरों ने पायजामा जींस को बनाने में दिमाग खपाया। जेगिंग ऐसा परिधान होता है जो जींस भी होता है और लेगिंग भी।
फैशन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की प्रोफेसर सांड्रा मार्कस मानती हैं कि पायजामा जींस बदलती जीवन शैली को दिखाता है। उन्होंने कहा कि इन दिनों पायजामा कैजुअल वियर है जिस पर युवाओं का प्रभाव है। पायजामे हर जगह पाए जाते हैं। वे हर जगह स्वीकार्य हैं तो पायजामे जींस क्यों नहीं?

Last Updated on Friday, 10 September 2010 09:50
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